क्यूँ आज के इस दौर में हर तरक्की फीकी नज़र आती है।
सबसे बड़ी गाड़ी भी छोटी नज़र आती है।
हर चीज़ प्रतिशत में मापी जाती है।
और हर सुख सुविधा की मौजूदगी में हंसी गायब हो जाती है।
जगजीत कह गए पर कहाँ घर बनते हैं घरवालों से।
सिमित हैं हम दीवारों, काँचों और यंत्रों से।
कुछ तो इंसानी फितरत है जो युगों से चली आई है।
और कुछ बीमारियां यह खुली सूचना भी लायी है।
हर कुछ खुला है, मन भी तन भी साधन भी।
गरीब तो देखकर दंग है, तक़रीबन सबकी शान्ति भंग है।
क्या करें ?
सब खुला है तो अपनी आँखें बंद कर लें।
दूसरों को छोड़ कुछ अपने आप को पढ़ लें।
अपनी आकांक्षाएं सीमित कर लें।
और अपनी उपलब्धियों के लिए कभी नमन कर लें।
Gurgaon, 2015
Gurgaon, 2015
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