Wednesday, December 23, 2015

शादी न करूँ?

नहीं नहीं मैं लड्डू खा के पछताने से नहीं डरता,
एक लड़की है जिस से मेरा जी नहीं भरता. 

पर हर कुछ दिनों में मेरे मन में यह सवाल है उमड़ता,
के मैं औरों के लिए कुछ क्यूँ नहीं करता.

गोबिंद, चाणक्य, चे, भगत का अंश मुझे लगता है मेरे अंदर है फलता,
पर शादी कर के इस पथ पर क्या मैं पाउँगा विफलता?

पहले मैं सोचता था हाँ, पर आज एक नया सुराग है मिलता,
जब कूद पड़ने का वक़्त आएगा तो रास्ता खुद खुल जायेगा.

गोबिंद का बच्चों से, चाणक्य का पिता चरक से, 
भगत का अपनी होनें वाली से भी तो लगाव था.

इसका अभिप्राय?

मेरे प्यारे मेरा बल हैं....... पर बिन इनके मैं और भी बलवान हूँ.

प्यार के रूप भीषण हो सकते हैं - कोमल भी और कठोर भी.....

जब जीवन का वो मोड़ आएगा ..... तो प्यार का उपयोक्त रूप खुद- ब- खुद काम आ जायेगा.

फिलहाल के लिए ---- शादी पक्की.

April 2011

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